Capital gains Tax India in hindi

Capital Gains Tax India in hindi – Capital Gain क्या होता है और Capital Gains पर टैक्स किस प्रकार से लगाया जाता है इसके बारे में अधिकतर लोग अनभिज्ञ रहते है और जब वे कोई प्रॉपर्टी बेचते है, तो इस पर कैपिटल गेन टैक्स जमा नहीं करवाते है।

लेकिन जब इनकम टैक्स डिपार्टमेंट से नोटिस आता है, तो उन्हें इस बारे में पता चलता है और तब तक उनकी टैक्स राशि पर Interest और Penalty लग चुकी होती है। तो आज के आर्टिकल (capital gain tax in hindi )में हम जानेंगे कि Capital gains Tax India में किस प्रकार से लगाया जाता है ।

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कैपिटल गेन क्या होता है ? ( what is capital gain ) –

Capital Gain Tax In India समझने से पहले हम जानेंगे कि Capital Gain क्या होता है।

मान लीजिये आप किसी सम्पति (Capital Assets) को बेच रहे है और उस सम्पति को बेचने पर आपको प्रॉफिट हो रहा है, तो यह प्रॉफिट आपका कैपिटल गेन होता है। इस कैपिटल गेन पर आपको इनकम टैक्स देना होगा और यह उस वर्ष में दिया जायेगा जिस वर्ष में आपने अपनी सम्पति बेचीं थी।

कैपिटल गेन पर टैक्स capital gain head के अन्तर्गत लगाया जाता है। लेकिन, अगर आपको अपनी सम्पति बेचने पर नुकसान हो रहा है तो आपको कुछ भी टैक्स नहीं देना है, परन्तु इस पूरे ट्रांजैक्शन को अपनी इनकम टैक्स रिटर्न में दिखाना होगा।

Capital Gain पर इनकम टैक्स लगाने के लिए सबसे जरुरी चीज यह है कि जिस सम्पति को बेचने से कैपिटल गेन हुआ है, वह सम्पति कैपिटल एसेट्स होनी चाहिए। यदि बेचीं जाने वाली सम्पति capital assets नहीं है तो इस पूरे ट्रांजैक्शन पर कैपिटल गेन हेड में टैक्स नहीं लगेगा।

what is a capital assets ? कैपिटल एसेट्स क्या होती है –

Capital Assets की परिभाषा में 2 तरह की assets को शामिल किया गया है, जो कि है –

  1. Capital Assets ऐसी एसेट्स होती है जो करदाता द्धारा धारित की जाती है व ऐसी एसेट्स का करदाता के बिज़नेस या प्रोफेशन से सम्बन्धित होना जरुरी नहीं है, या
  2. Foreign Institutional Investor द्वारा धारित सिक्योरिटीज ।

लेकिन कुछ एसेट्स को Capital Assets नहीं माना गया है और इनको बेचने पर किसी प्रकार का लाभ Capital Gain हैड के अन्तर्गत टैक्सेबल नहीं होगा।

For Examples –

  1. करदाता द्वारा बिज़नेस या प्रोफेशन के लिए रखा गया व्यापारिक स्टॉक,
  2. Personal Assets जो करदाता द्धारा अपने लिए या अपने ऊपर आश्रित किसी परिवार के सदस्य के Personal Use के लिए रखी गयी हो, लेकिन  Personal Assets में Jewellery, Archaeological Collection, Drawings, Paintings, Or Any Work Of Art को शामिल नहीं किया जायेगा,
  3. ग्रामीण कृषि भूमि,
  4. 6.5 % Gold Bond/Special Bearer Bond,
  5. Gold Deposit Bond,
  6. Deposit Certificate Issued Under Gold Monetisation  Scheme 2015

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कैपिटल एसेट्स को ट्रांसफर करना क्या होता है ? Meaning of Transfer

Capital Gain पर टैक्स तब लगाया जाता है, जब Capital Assets ट्रांसफर की जाती है । यदि एसेट्स ट्रांसफर नहीं की जाती है तो किसी प्रकार का टैक्स नहीं लगेगा।  इसलिए किसी assets को ट्रांसफर करने का मतलब पता होना चाहिये।

इनकम टैक्स एक्ट के अनुसार किसी Capital Assets का ट्रांसफर तब माना जाता है, जब –

  1. किसी एसेट्स (Capital Assets) का Sale, Exchange, Relinquishment, Extinguishment हो, या
  2. किसी एसेट्स का Compulsory Acquisition हो, या
  3. कैपिटल एसेट्स का स्टॉक इन ट्रेड में Conversion हो, या
  4. Zero Coupon Bond की Maturity या Redemption पर ।

Types of Capital Assets 

Capital Assets को उनके द्धारा धारित करने की अवधि के आधार पर दो भागों में बांटा गया है।  (1.) Short Term Capital Assets (2) Long Term Capital Assets ।

  1. शार्ट टर्म कैपिटल एसेट्स – यह ऐसी एसेट्स  होती है जो ट्रांसफर करने की तारीख से पूर्व करदाता द्धारा 24 महीने या उससे कम अवधि के लिए धारित की गयी हो। लेकिन कुछ एसेट्स ऐसी भी होती है जिनकी धारण करने की अवधि 12 महीने या उससे कम हो तभी शार्ट टर्म कैपिटल एसेट्स मानी जाती है, जैसे – (a.) ऐसी सिक्योरिटीज जो कि भारत में मान्यता प्राप्त स्टॉक एक्सचेंज में सूचिबद्ध है, (b) यूनिट ट्रस्ट ऑफ़ इंडिया (UTI ) की यूनिट्स, (c) सेक्शन 10 (23 D) में वर्णित Equity Oriented Mutual Funds की यूनिट्स, (d) Zero Coupon Bond आदि ।

Unlisted Shares को Short Term Capital Assets तब माना जाता है, जब वह ट्रांसफर की तारीख से पूर्व 24 महीने या कम अवधि के लिए धारित की गयी हो।

इसके अलावा Units of debt oriented mutual fund (listed or unlisted ) के केस में 36 महीनो से कम समय के लिए रखने पर उन्हें शार्ट टर्म कैपिटल एसेट्स माना जायेगा।

2. Long Term Capital Assets – ऐसी एसेट्स जो Short Term Capital Assets के अलावा होगी Long Term Capital Assets मानी जाएगी ।

सामान्य तौर पर Capital Assets को ट्रांसफर करने पर प्रॉफिट उस वर्ष में टैक्सेबल होता है जिस Previous Year में एसेट्स ट्रांसफर की गयी थी न कि उस ईयर में जब  Consideration प्राप्त हुआ हो, लेकिन कुछ केस में कैपिटल गेन टैक्सेबल उस वर्ष में टैक्सेबल होगा जब Consideration प्राप्त हुआ था।

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Capital Gains Tax India in hindi

Capital Gains Taxes को टैक्स लगाने के लिए दो पार्ट में डिवाइड किया जाता है। (1) लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन  (2) शार्ट टर्म कैपिटल गेन

लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन टैक्स Long Term Capital Assets पर लगाया जाता है जिसकी टैक्स रेट 20 % है लेकिन लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन टैक्स की कम्प्यूटेशन में आप Indexation का बेनिफिट ले सकते है।

जबकि शार्ट टर्म कैपिटल गेन टैक्स Short Term Capital Assets पर लगाया जाता है जिसकी टैक्स रेट 15 % है लेकिन यह रेट तभी लागू होगी जब आपके द्वारा सेल की गयी Short Term Capital Assets किसी कंपनी के Equity Share हो या Equity Oriented Mutual Fund की Units हो ।

अन्य किसी सिचुएशन में शार्ट टर्म कैपिटल गेन की राशि Individual या HUF की इनकम में जोड़ ली जाती है और उस पर इनकम टैक्स की स्लैब्स के हिसाब से टैक्स लगाया जाता है।

ऐसे केस जहाँ ट्रांजैक्शन वाले वर्ष के अलावा दूसरे वर्ष में टैक्स लगाया जायेगा – Different Year & Scope of Capital gains tax india –

सामान्य तौर पर कैपिटल गेन पर टैक्स उस ईयर में लगाया जायेगा जिस ईयर में उस कैपिटल एसेट्स को बेचा गया था। लेकिन कुछ ऐसे केस भी है जहाँ ट्रांजैक्शन वाले वर्ष की जगह किसी अन्य वर्ष में टैक्स लगाया जाता है। ऐसे केस है –

Insurance Compensation –

जब किसी व्यक्ति को किसी Capital Assets के नष्ट या नुकसान होने से बीमा के अंतर्गत बीमा राशि या कोई सम्पति प्राप्त होती है जिससे उस व्यक्ति को कोई लाभ हो तो यह उस Previous Year में टैक्सेबल होगी जब यह राशि या सम्पति प्राप्त होती है।

लेकिन यदि capital assets चोरी हो जाती है, तो कैपिटल एसेट्स के चोरी हो जाने पर प्राप्त Insurance Compensation किसी भी तरह के Taxation को Attract नहीं करता है।

Conversion or Treatment of a Capital Assets In Stock In Trade –

जब किसी Capital Assets के मालिक द्वारा अपनी कैपिटल एसेट्स को व्यापारिक स्टॉक में परिवर्तित किया जाता है तो यह भी ट्रांसफर माना जाता है, परंतु यह उस ईयर में टैक्सेबल होगा जब यह व्यापारिक स्टॉक बेचा जाता है या अन्य प्रकार से ट्रांसफर किया जाता है ।

और यदि परिवर्तित व्यापारिक स्टॉक पूरा सेल नहीं किया जाता तो Capital Gain का उतना ही पार्ट टैक्सेबल होगा जितना स्टॉक सेल किया गया है।

Capital Gains Tax की कैलकुलेशन के लिए के लिए Conversion की Date को कैपिटल एसेट्स की Fair Market Value को  Consideration Price माना जायेगा।
Capital Gain/Loss = Consideration Price  – Cost Of Acquisition
Business Income = Sale Price – Consideration Price

Transfer of Assets By Partner or Member To Firm/AOP/BOI –

जब कोई व्यक्ति जो किसी Firm/AOP/BOI का Partner या Member है या Partner या Member बनने वाला हो वह Capital Contribution या अन्य किसी रूप में Firm/AOP/BOI को कैपिटल एसेट्स ट्रांसफर करता है तो यह Capital Gain हेड में पार्टनर या मेंबर के हाथों में टैक्सेबल होगा।

यह Capital Gain उस ईयर में टैक्सेबल होगा जब ऐसा ट्रांसफर हुआ था और टैक्सेशन  के लिए Sale Consideration की राशि वह ली जाएगी जो Books of Accounts में रिकॉर्ड की गयी थी ।

Distribution of Capital Assets By Firm/AOP/BOI To Partners/Members –

किसी Firm/AOP/BOI के Dissolution या Otherwise (Include Retirement of Partner) के समय Partner या Member को किये गए कैपिटल एसेट्स का ट्रांसफर पर होने वाला कैपिटल गेन फर्म के हाथों में टैक्सेबल होगा और यह उस ईयर में टैक्सेबल होगा जिस ईयर में ट्रांसफर हुआ था।

यदि कोई पार्टनर फर्म से Retire होता है तो उसे दी जाने वाली Capital Assets फर्म के हाथों  टैक्सेबल होगी न कि पार्टनर के हाथों में।

कैपिटल गेन की कैलकुलेशन के लिए ट्रांसफर की तारीख को ऐसी सम्पति की Fair Market Value को Sales Consideration माना जायेगा।

Read More On Clubbing of Income के इन प्रावधानों के बारे में नहीं पता तो हो सकती आपकी इनकम के कैलकुलेशन में गलती।

Compensation On Compulsory Acquisition –

यदि किसी Capital Assets का किसी law के अंतर्गत Compulsory Acquisition होता है या कोई ऐसा ट्रांसफर जिसका Consideration सेंट्रल गवर्नमेंट या RBI द्वारा निर्धारित या एप्रूव्ड किया जाता है तो होने वाला Capital Gain उस ईयर में टैक्सेबल होगा जिसमे Assessee द्वारा ऐसा Compensation या उसका कोई पार्ट प्रथम बार प्राप्त किया गया था ।

कई बार कोर्ट द्वारा Compensation की राशि बढ़ा दी जाती है, ऐसी सिचुएशन में बढ़े हुए Compensation की राशि उस Previous Year में टैक्सेबल होगी जिस Previous Year में बढ़े हुए Compensation की राशि प्राप्त होती है।

बढ़े हुए Compensation की टैक्स कैलकुलेशन के लिए Cost Of Acquisition & Cost Of Improvement की लागत NIL मानी जाती है लेकिन इसे प्राप्त करने के लिए किये गए गए Legal Expenses की छूट प्राप्त होगी।

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